मुत्तकी का फरमान भारत में भी!

10 अक्टूबर को भारत पूरी दुनिया के सामने शर्मसार हुआ। देश की राजधानी, नई दिल्ली की सरज़मीं पर पहली बार एक ऐसी पत्रकार वार्ता आयोजित की गयी जिसमें महिला पत्रकारों का एक चेहरा भी दिखाई नहीं दिया। औरतों को पूरी तरह अदृश्य कर दिया गया, जैसे कि यह पत्रकार सम्मेलन भारत नहीं, अफ़ग़ानिस्तान में हो रहा हो। अफ़ग़ानिस्तान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी के यहां यह रिवायत हो सकती है, पर यह रिवायत जब सरहद पार कर अनायास भारत में पसर जाती है, तो हैरत होती है।

आखिर नई दिल्ली में किसका कानून चल रहा है? हमारे अपने देश का या तालिबान का? भले ही अफ़ग़ानिस्तान के दूतावास में सम्मेलन हो रहा था, हमारा विदेश मंत्रालय हस्तक्षेप करके कह सकता था कि महिला पत्रकारों को बाहर नहीं रखा जा सकता, और अगर ऐसा हुआ तो प्रेस वार्ता में न हमारी भागीदारी होगी न ही हमारी मीडिया की। पर ऐसा नहीं हुआ। 

भारतीय मीडिया में काम करने वाली महिलाओं की सरेआम तौहीन की गयी, उन्हें नाकाबिल ठहराया गया और, इस प्रकार, पूरे देश की महिलाओं का अपमान हुआ। सबसे अजीब बात यह थी कि भारत सरकार और उसके विदेश मंत्रालय ने बड़ी आसानी और चालाकी से प्रेस वार्ता से अपनी दूरी बना ली और ज़िम्मेदारी लेने से पूरी तरह पीछे हट गये। उनका बयान आया कि इस प्रतिबंध में उनकी कोई भूमिका नहीं थी। अविश्वसनीय! सम्मेलन चांद पर तो हो नहीं रहा था। केंद्र सरकार की नाक के नीचे राजधानी में ही हो रहा था।

निंदा हुई चहुं ओर

इस घटना की प्रतिक्रिया भी सामान्य नहीं थी। मीडिया से लेकर कांग्रेस ने कड़े तेवर दिखाये। राहुल गांधी का बयान आया कि “इस तरह से इवेंट को अनुमति देकर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने देश की हर महिला को बता दिया कि वे उनका पक्ष लेने के मामले में कितने कमज़ोर हैं”। वे आगे बोले “हमारे देश में महिलाओं को हर क्षेत्र में समान भागीदारी का अधिकार है। ऐसे भेदभाव के सामने आपका मौन ‘नारी शक्ति’ के आपके नारों के खोखलेपन को उजागर करता है।”

प्रियंका वाडरा ने भी मोदी की राजनीतिक घेरेबंदी करते हुए “महिला पत्रकारों को एम्बैसी गेट से बाहर करने को महिलाओं का अपमान बताते हुए पीएम से कहा कि “अगर महिलाओं के अधिकारों को लेकर आपकी मान्यता सिर्फ एक चुनाव से दूसरे चुनाव तक सीमित दिखावा नहीं है, तो फिर हमारे देश में, जहां महिलाएं हमारी रीढ़ हैं, हमारी शान हैं, इतनी योग्य महिला पत्रकारों का यह अपमान कैसे होने दिया गया?” उधर टीएमसी की सांसद महुआ मोइत्रा का तल्ख बयान आया, “हमारी सरकार कैसे हिम्मत के तहत तालिबान के विदेश मंत्री आमिर मुत्तकी को भारतीय भूमि पर महिलाओं को बाहर रखकर ‘सिर्फ पुरुषों के लिए’ प्रेस कॉन्फ़्रेंस करने की अनुमति दी — वो भी पूरे प्रोटोकॉल के साथ? डॉ. एस जय शंकर ने इसे कैसे मंज़ूरी दी? और हमारे निर्बल, बिना रीढ़ के पुरुष पत्रकार उस कमरे में रह कैसे गए?” 

“द हिन्दू” की सुहासिनी हैदर ने विदेश मंत्रालय से पूछा कि क्या उसने इस तरह के बहिष्कार को मंज़ूरी दी थी? उन्होंने लिखा, “सबसे हास्यास्पद बात यह है कि तालिबान के विदेश मंत्री को महिलाओं के प्रति उनके घृणित और अवैध भेदभाव को भारत लाने की अनुमति दी गई है, जबकि सरकार पूरी आधिकारिक औपचारिकता के साथ तालिबान प्रतिनिधिमंडल की मेज़बानी कर रही है। यह व्यवहार व्यवहारिकता नहीं, बल्कि आत्मसमर्पण है।” वरिष्ठ पत्रकार सागरिका घोष ने भी इस बहिष्कार को “अस्वीकार्य और घृणित” बताया। एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया और इंडियन वीमेन प्रेस कोर (IWPC) ने भी इस घटना को अत्यंत भेदभावपूर्ण करार दिया और कहा कि इसे वियना कन्वेंशन के तहत राजनयिक विशेषाधिकार के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता। ऐडवा ने भी इस घटना की कड़ी निंदा की।

विरोध के आगे झुकना पड़ा तालिबानियों को

रविवार को दोबारा आमिर खान मुत्तकी ने अफगान दूतावास में प्रेस वार्ता आयोजित की, और इस बार पुरुष पत्रकारों के लगभग बराबर संख्या में महिला पत्रकारों ने भी हिस्सा लिया। यह भारतीय विपक्ष और मीडिया की तल्ख प्रतिक्रिया का नतीजा था। ज़रूर चुनाव की पूर्वबेला में भाजपा सरकार अपनी छवि खराब नहीं करना चाहती थी; उसे डर था कि मीडिया के लोग इस मुद्दे को उछाल दें तो बिहार का महिला वोट, जिसे नीतीश कुमार ने बड़ी शिद्दत से जुटाया है, पलायन कर जायेगा। यहां तो गोदी मीडिया का भी समान रुख होगा। मुत्तकी ने सफाई भी दी कि यह अनायास ही हुआ था- इसमें कोई सोची-समझी चाल नहीं थी, क्योंकि चुनिंदा मीडिया एजेंसियों को ही बुलाने के लिये एक लिस्ट तैयार किया गया था। 

लीपापोती से कोई संतुष्ट नहीं

पर यह सफाई संतोषजनक नहीं थी, क्योंकि आखिर उन चुनिंदा पत्रकारों में एक-दो महिला पत्रकार तो हो सकती थीं! दूसरी बात यह कि वे गेट तक आईं भी, पर उन्हें अंदर आने से मना कर दिया गया। भारत सरकार की सफाई भी किसी के गले नहीं उतरी। आखिर दूतावास तो नई दिल्ली में है, और हमारे मंत्री और पुरुष पत्रकार उसमें शामिल भी हुए। उन्होंने प्रतिकार क्यों नहीं किया? बायकॉट करके महिला पत्रकारों के साथ क्यों नहीं खड़े हुए? मान लें कि इस स्थिति का आभास उन्हें नहीं था। तो, शुक्रवार को ही विदेश मंत्रालय, भारत सरकार और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय सहित महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और महिला आयोग का बयान क्यों नहीं आया कि भारत में यह तालिबानी परिपाटी नहीं चलेगी? ‘करेक्टिव मेज़र्स’ के लिये आखिर 48 घंटे क्यों लग गये?

आरएसएस-भाजपा की विचारधारा भी अलग नहीं

शायद सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों को बहुत आश्चर्य नहीं हुआ होगा, जब 17 मीडिया एजेंसियों को आमंत्रित करने के बाद भी कमरे में एक भी महिला पत्रकार नहीं दिखी। आरएसएस के प्रारंभिक दौर में महिलाओं को संघ में नहीं लिया जाता था। जब लिया भी गया तो दो ही भूमिकाओं में-मां के रूप में जो परिवार की धुरी होगी पर पुरुष के अधीन; या योद्धा के रूप में, यानी आग उगलने वाली रणचंडी के रूप में। हमने देखा भी है कि इन्हीं भूमिकाओं में औरतों का महिमा मंडन किया गया-वे तीज-त्योहारों में व्रत रखती, भजन-कीर्तन करतीं, या फिर पुरुषों को दंगों में या मस्जिद ढहाने में ललकारतीं और मदद देतीं।

स्वतंत्र, पढ़ने-लिखने वाली, कामकाजी, कैम्पसों और जन आन्दोलनों में मर्दों के संग कंधे से कंधा मिलाकर लड़ती हुईं, अपने हकों के दायरे को लगातार बढ़ाती हुई औरतें इनके नैरेटिव में केवल ‘बुरी औरत, चरित्रहीन औरत, अर्बन नक्सल या आतंकवादियों की बहन’कहलाती हैं। इसलिये सोशल मीडिया में भक्तगण महुआ मोइत्रा पर अश्लील फब्तियां कस रहे थे और खुशी ज़ाहिर कर रहे थे कि ‘मर्दों’ की प्रेस वार्ता से महिलाओं को ‘आउट’ कर दिया गया था। पर हां, महिलाएं एक बहुत बड़ा वोट बैंक ज़रूर हैं, जिनको लुभाने के लिये 10-10 हज़ार रुपये उनके अकाउंट तक में डाले जा सकते हैं। बिहार के चुनाव में भाजपा का फोकस महिलाएं और युवा हैं। पर इस राज्य में औरतों पर लगातार बढ़ता अत्याचार मुद्दा नहीं है। 

एक ही सिक्के के दो पहलू

अगर ये हिन्दू कट्टरपंथ के झंडाबरदार हैं तो तालिबान का नेता मुत्तकी भी सिक्के का दूसरा पहलू, यानी इस्लामिक कट्टरपंथ का अलम्बरदार है। अफ़ग़ानिस्तान में दोबारा सत्ता पर काबिज हुए तालिबान ने 2021 में भी बहुत सारे फतवे जारी किये थे। औरतें प्राइमरी से आगे शिक्षा हासिल नहीं कर सकतीं, वे सार्वजनिक जगहों पर जा नहीं सकतीं और एक दूसरे से बात नहीं कर सकतीं, वे बाहर काम नहीं कर सकतीं, वे गा नहीं सकतीं और खिड़कियों से बाहर देख तक नहीं सकतीं।

पर अफ़ग़ानिस्तान के विदेश मंत्री मुत्तकी के दिल्ली आने पर किसी भी महिला संगठन ने अफ़ग़ानी महिलाओं के बुनियादी अधिकारों के समर्थन में एक भी प्रदर्शन नहीं किया न बयान ही दिया। यह तो गनीमत है कि महिला पत्रकारों ने इस सवाल पर उन्हें अच्छे से घेरा। पर हमारे देश के मुखिया की भांति उन्होंने भी झूठ का पुलिंदा खोलकर अपनी साख बचानी चाही। यह सच है कि भारत सरकार को अफ़ग़ानिस्तान में अपने हितों को देखते हुए तालिबान सरकार से बात करनी पड़ सकती है। पर कूटनीति के मायने यह नहीं कि हम अपने बुनियादी सिद्धांतों पर समझौता कर लें, जिसमें महिला अधिकार सबसे महत्वपूर्ण है!

(कुमुदिनी पति महिला एक्टिविस्ट और लेखिका हैं।)

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